सत्ता के गलियारों में सन्नाटा: रग्बी खेलने वालों से भी कम बचे देश चलाने वाली पार्टियों के सदस्य!

सत्ता के गलियारों में सन्नाटा: रग्बी खेलने वालों से भी कम बचे देश चलाने वाली पार्टियों के सदस्य! · Avonetics
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कल्पना कीजिए कि किसी देश की दो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियां, जो बारी-बारी से सत्ता की कुर्सी संभालती हैं और करोड़ों लोगों के भविष्य का फैसला करती हैं, उनके कुल सदस्यों की संख्या उस देश में रग्बी खेलने वाले खिलाड़ियों से भी आधी रह जाए! सुनने में यह किसी सियासी व्यंग्य जैसा लगता है, लेकिन ब्रिटेन की राजनीति का आज यही सबसे कड़वा और चौंकाने वाला सच है।
संसद के गलियारों से बाहर आए आंकड़े बताते हैं कि 1950 के दशक में राजनीतिक पार्टी का सदस्य होना आम जनजीवन का एक अहम हिस्सा था। उस दौर में लेबर पार्टी के पास दस लाख से अधिक और कंजर्वेटिव (टोरी) पार्टी के पास अट्ठाईस लाख से ज्यादा समर्पित सदस्य थे। लेकिन आज की तस्वीर बिल्कुल उलट है। लेबर पार्टी महज दो लाख साठ हजार सदस्यों पर सिमट गई है, जो पचहत्तर फीसदी की गिरावट है। वहीं टोरी पार्टी की हालत तो और भी बदतर है, जहां पचानवे फीसदी की भारी गिरावट के साथ सिर्फ एक लाख तेईस हजार सदस्य बचे हैं।
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यह स्थिति तब है जब ये दोनों पार्टियां फ्रांस या इटली की पुरानी पार्टियों की तरह सत्ता से बाहर नहीं हुई हैं, बल्कि आज भी राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं। लेकिन दोनों को मिलाकर भी चार लाख सदस्य नहीं हैं, जबकि ब्रिटेन में आठ लाख लोग रग्बी खेलते हैं। यही वजह है कि आज सांसदों और आम जनता के बीच एक गहरी खाई साफ दिखाई देती है।
आखिर यह सियासी पतन कैसे हुआ? इस सवाल पर विश्लेषकों और आम नागरिकों के बीच दो अलग-अलग राय सामने आती हैं। एक वर्ग का मानना है कि इसके पीछे कोई राजनीतिक नाराजगी नहीं, बल्कि समाज और मनोरंजन के बदलते तौर-तरीके हैं।
एक टिप्पणीकार ने कहा कि अस्सी साल पहले लोगों के पास आज की तरह क्लब, रेस्तरां, जिम, टीवी या इंटरनेट नहीं था। घर ठंडे और अंधेरे होते थे और पब में एक पिंट बीयर खरीदना आज के मुकाबले दोगुना महंगा था, जिसके लिए आधे घंटे की मजदूरी लगती थी। ऐसे में स्थानीय कंजर्वेटिव क्लब या लेबर से जुड़े वर्किंग मेन्स क्लब ही मेलजोल, डांस और सोशल लाइफ के सबसे बड़े केंद्र थे।
किसी और ने तर्क दिया कि उस दौर में युवा जोड़े इन राजनीतिक क्लबों में ही मिलते थे, लेकिन आज ट्रेड यूनियनों के कमजोर पड़ने और स्काउट्स, रोटरी क्लब व चैरिटी संस्थाओं से लोगों के मोहभंग होने का सीधा असर पार्टियों पर भी पड़ा है। घर बैठे मनोरंजन के साधनों ने राजनीतिक बैठकों को बेहद उबाऊ बना दिया है।
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लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू कहीं ज्यादा तीखा और सियासी है। एक बड़े वर्ग का मानना है कि पार्टियों ने खुद जनता को अपने से दूर किया है। एक व्यक्ति ने साफ शब्दों में कहा कि आज किसी को यह भरोसा नहीं है कि कोई भी पार्टी वास्तव में आम आदमी के लिए काम कर रही है।
एक अन्य नागरिक ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा कि कड़ी मेहनत कर ज्यादा कमाने वालों पर लेबर पार्टी सिर्फ टैक्स का बोझ लादना चाहती है, जबकि टोरी पार्टी ने अपने चौदह साल के शासन में देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया है। ऐसे में किसी भी पार्टी का कार्ड लेना पागलपन जैसा लगता है।
कई लोगों ने इस बात पर भी उंगली उठाई कि राजनीतिक दल अब चुनाव के अलावा कभी जनता के बीच जाकर संवाद नहीं करते। पार्टियां सिर्फ बुजुर्ग वोटरों को लुभाने में लगी रहती हैं, जबकि महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रहे युवाओं के लिए उनके पास कोई ठोस एजेंडा नहीं है। जैसा कि एक व्यक्ति ने तंज कसते हुए कहा, पार्टियों को अपने सदस्यों की याद सिर्फ तब आती है जब उन्हें चंदे के लिए पैसे मांगने हों या फिर चुनाव में मुफ्त में पर्चे बंटवाने हों।
क्या यह सिर्फ बदलते वक्त की कहानी है या लोकतंत्र के खोखले होने की चेतावनी? हमारे शो 'सियासत' के मेजबान आज के पॉडकास्ट एपिसोड में इसी मुद्दे की हर परत को खोल रहे हैं और आमने-सामने की तीखी बहस कर रहे हैं।