मुफ्त की खैरात या अधिकार? चुनावों में 'फ्रीबीज' के वादों ने छेड़ी इंटरनेट पर महाबहस!

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चुनाव आते ही नेताओं की जुबान पर विकास के लंबे-चौड़े भाषणों से ज्यादा 'फ्री' शब्द हावी होने लगता है। मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त सफर और अब सीधे खाते में नकद पैसा। यह एक ऐसा फॉर्मूला बन चुका है जो चुनाव जिताने की गारंटी माना जाने लगा है। लेकिन क्या यह मुफ्त की खैरात वास्तव में गरीब का भला कर रही है या फिर देश को आर्थिक तबाही की ओर धकेल रही है?
हाल ही में इंटरनेट पर इस विषय को लेकर बहस छिड़ गई कि कई राज्य सरकारें भारी कर्ज में डूबी होने के बावजूद खरबों रुपये की मुफ्त योजनाएं चला रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक, कुछ राज्यों का कर्ज उनके कुल बजट के 30 से 40 फीसदी तक पहुंच चुका है। यानी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को गिरवी रखकर आज वोट खरीदे जा रहे हैं।
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एक विश्लेषक ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जब आप किसी नागरिक को अस्पताल या स्कूल देने के बजाय केवल कुछ हजार रुपये महीने का लालच देते हैं, तो आप उसे स्थायी रूप से लाचार बना रहे हैं। यह विकास नहीं, बल्कि वोट बैंक सुरक्षित करने का राजनीतिक खेल है।
दूसरी तरफ, इस व्यवस्था के समर्थकों का तर्क भी काफी मजबूत है। एक अन्य यूजर ने लिखा कि जब बड़े उद्योगपतियों के अरबों रुपये के कर्ज माफ किए जा सकते हैं, तो किसी गरीब महिला को दो हजार रुपये की मदद मिलने पर उसे 'रेवड़ी' क्यों कहा जाता है? भारत जैसे देश में जहां असमानता इतनी अधिक है, वहां नकद हस्तांतरण ही एकमात्र सहारा बनता है।
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रिजर्व बैंक और सुप्रीम कोर्ट की चेतावनियों के बावजूद कोई भी राजनीतिक दल इस रास्ते से पीछे हटने को तैयार नहीं है। स्थिति यह है कि अब एक पार्टी के वादे के जवाब में दूसरी पार्टी उससे दोगुना बड़ा वादा लेकर मैदान में उतर जाती है।
आखिर इस आर्थिक जादूगरी की अंतिम कीमत किसे चुकानी पड़ेगी? क्या टैक्स भरने वाला मध्यम वर्ग इस पूरी व्यवस्था में पिस रहा है? इन्हीं तीखे सवालों और आंकड़ों का सच टटोलने के लिए 'सियासत' के नए एपिसोड को जरूर सुनें।
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