34% वोट और 63% सत्ता! क्या मौजूदा चुनावी सिस्टम जनता का जनमत चुरा रहा है?

ब्रिटेन के ऐतिहासिक चुनावी नतीजों के बाद अब दुनिया भर में फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली को बदलने की मांग तेज हो गई है।
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2024 के यूके आम चुनाव ने पूरी दुनिया के राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। चुनावी नतीजों के आंकड़ों ने एक ऐसा विरोधाभास खड़ा कर दिया है जिसने लोकतांत्रिक देशों की बुनियाद हिला दी है। लेबर पार्टी ने महज 34 प्रतिशत राष्ट्रीय वोट हासिल करके संसद की 63 प्रतिशत सीटों पर कब्जा कर लिया। यह ब्रिटेन के इतिहास का सबसे असंतुलित परिणाम माना जा रहा है।

इस फैसले के बाद से ही ब्रिटेन की सड़कों से लेकर संसद के गलियारों तक हंगामा मचा हुआ है। एक ताज़ा सर्वे के मुताबिक 60 प्रतिशत ब्रितानी नागरिक अब इस चुनावी सिस्टम से आज़ाद होना चाहते हैं। उनका मानना है कि 'फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट' प्रणाली अब पुरानी पड़ चुकी है और यह जनता के असली जनादेश को पूरी तरह से विकृत कर देती है।

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राजनीतिक हलचलों के बीच नए प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने खुद समानुपातिक प्रतिनिधित्व का समर्थन कर दिया है। इसके साथ ही लिबरल डेमोक्रेट्स ने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है कि अगले चुनाव से पहले इस पुरानी वोटिंग व्यवस्था को उखाड़ फेंका जाए। लेकिन क्या यह सुधार इतना आसान है जितना दिखता है?

इस मुद्दे पर दुनिया भर के विचारक दो धड़ों में बँट चुके हैं। एक विश्लेषक ने कहा कि जब तक हम समानुपातिक वोटिंग या सिंगल ट्रांसफ़रेबल वोट जैसी आधुनिक व्यवस्थाओं को नहीं अपनाते, तब तक लाखों मतदाताओं का वोट बेकार जाता रहेगा। उनके मुताबिक, ऐसी प्रणालियाँ यह सुनिश्चित करती हैं कि संसद में हर विचार और हर छोटे दल को उसकी सही हिस्सेदारी मिले।

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दूसरी तरफ, आलोचकों का तर्क बिल्कुल अलग है। एक अन्य टिप्पणीकार ने तर्क दिया कि समानुपातिक वोटिंग में मतदाता अपने स्थानीय नेता को नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों की एक अमूर्त सूची को चुनते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि पार्टी के अंदरूनी आका यह तय करेंगे कि कौन संसद में बैठेगा और कौन नहीं। इससे स्थानीय मुद्दों की अनदेखी होगी और सांसदों की अपनी जनता के प्रति जवाबदेही पूरी तरह खत्म हो जाएगी।

यही नहीं, कुछ जानकारों का मानना है कि संविधान को पूरी तरह बदलने के बजाय प्रतिनिधि सभा की सीटों की संख्या बढ़ाना या इंस्टेंट रनऑफ वोटिंग को लागू करना ज्यादा व्यावहारिक रास्ता हो सकता है। फिलहाल यह बहस थमने का नाम नहीं ले रही है।

इस चुनावी घमासान के पीछे के असल समीकरण क्या हैं और क्या लोकतंत्र को बचाने के लिए वोटिंग सिस्टम बदलना ही आखिरी रास्ता है? हमारे शो 'सियासत' के नए एपिसोड में हमारे होस्ट्स इसी तीखे मुद्दे की परतें खोल रहे हैं।

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