क्या समानुपातिक वोटिंग से खत्म हो जाएगी आपके स्थानीय सांसद की जवाबदेही?

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लोकतंत्र का सबसे खूबसूरत पहलू यह माना जाता है कि आम जनता अपने क्षेत्र के नेता का चुनाव खुद करती है और उसकी नाकामी पर उसे पद से हटा भी सकती है। लेकिन ब्रिटेन के हालिया चुनावों के बाद जिस समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की वकालत की जा रही है, वह इस पूरी अवधारणा को पलट सकती है।
ब्रिटेन में लेबर पार्टी की भारी जीत और 60 प्रतिशत जनता द्वारा चुनाव प्रणाली बदलने की मांग के बाद, अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी आधारित वोटिंग व्यवस्था वाकई जनता के हित में है? इस प्रणाली के तहत मतदाता किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि राजनीतिक दल को वोट देते हैं और संसद की सीटें पार्टी को मिले वोट प्रतिशत के आधार पर बांटी जाती हैं।
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इस व्यवस्था के विरोध में आवाज़ें बुलंद होने लगी हैं। एक राजनीतिक विश्लेषक ने कहा कि अगर पार्टी के अंदरूनी आका यह तय करेंगे कि 'उम्मीदवारों की सूची' में कौन आगे रहेगा, तो आम जनता की ताकत पूरी तरह खत्म हो जाएगी। उनका तर्क है कि जब सांसदों का चुनाव पार्टी की कृपा पर निर्भर करेगा, तो वे जनता के प्रति नहीं, बल्कि अपनी पार्टी के अध्यक्ष के प्रति वफादार रहेंगे।
दूसरी ओर, इस बदलाव के समर्थकों की भी कमी नहीं है। एक अन्य टिप्पणीकार ने तर्क दिया कि मौजूदा व्यवस्था में नेता अक्सर अपने फायदे के लिए चुनावी क्षेत्रों को बदलते रहते हैं और फर्जी निवास प्रमाण पत्र बनाते हैं। उनके अनुसार, समानुपातिक प्रणाली से संसद में विविधता आएगी और छोटे दलों तथा वंचित वर्गों को भी सरकार में आवाज़ उठाने का मौका मिलेगा।
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इसके बावजूद, कई नागरिक अपने स्थानीय सांसद से सीधा संबंध खोने की सोच से ही आशंकित हैं। यदि आपके क्षेत्र का विकास किसी ऐसे सांसद के हाथ में आ जाए जिसे पार्टी ने सूची से भेजा है और जिसका उस इलाके से कोई लेना-देना नहीं है, तो जवाबदेही तय करना असंभव हो जाएगा।
क्या यह व्यवस्था केवल पार्टी हाईकमान को असीमित अधिकार देने का नया तरीका है? इस दिलचस्प राजनीतिक पहेली के हर पहलू को गहराई से समझने के लिए सुनिए हमारे शो 'सियासत' का यह खास एपिसोड।