"मैं तुमसे प्यार नहीं करता!": जब 4 साल के मासूम के कड़वे शब्दों ने तोड़ा पिता का दिल

डेकेयर से घर लौटने से इनकार करने पर जब एक बच्चे ने अपने पिता से कड़वे बोल कहे, तो पेरेंटिंग की दुनिया में बहस छिड़ गई।
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परवरिश के सफर में ऐसे कई पल आते हैं जो माता-पिता के धैर्य की कड़ी परीक्षा लेते हैं। लेकिन कुछ पल ऐसे भी होते हैं जो सीधे दिल पर वार करते हैं। हाल ही में एक पिता के साथ कुछ ऐसा ही हुआ, जब उनके चार साल के बेटे ने डेकेयर से घर वापस जाने से साफ़ इनकार कर दिया।

डेकेयर उस नन्हे बच्चे के लिए पसंदीदा जगह है, जहाँ दोस्त, खिलौने और एक बड़ा प्लेग्राउंड है। जब पिता उसे लेने पहुँचे, तो बच्चे का मन घर लौटने का बिल्कुल नहीं था। पिता ने लगभग 20 मिनट तक 'जेंटल पेरेंटिंग' यानी सौम्य परवरिश के तमाम तरीके अपनाए। उन्होंने प्यार से समझाया, घर में खेलने का लालच दिया और अगले दिन फिर आने का वादा भी किया। लेकिन जब बच्चा टस से मस न हुआ, तो पिता को मजबूरी में उसे गोद में उठाकर कार की तरफ बढ़ना पड़ा।

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इसी खींचतान के बीच बच्चे ने चिल्लाते हुए वे चार शब्द कह दिए, जो किसी भी माता-पिता का दिल तोड़ सकते हैं— "मैं तुमसे प्यार नहीं करता!"

एक वयस्क के रूप में वह पिता जानते हैं कि चार साल के बच्चे में अपनी भावनाओं को सही तरीके से व्यक्त करने की समझ नहीं होती। उन्हें यह भी पता है कि बच्चा सच में ऐसा नहीं मानता। लेकिन इसके बावजूद, उन शब्दों का डंक इतना गहरा था कि वह दिन भर उस दर्द से उबर नहीं पाए।

हालाँकि, घर पहुँचकर जैसे ही पिता ने बच्चे से डाकपेटी से चिट्ठियाँ निकालने में मदद माँगी, बच्चा तुरंत सामान्य हो गया। उसने पिता को गले लगाया और 'आई लव यू' भी कहा। बच्चा तो आगे बढ़ गया, लेकिन पिता के मन में यह सवाल छोड़ गया कि क्या उन्होंने कहीं कोई चूक की?

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इस घटना पर अभिभावकों की राय दो हिस्सों में बँट गई है। एक पक्ष का मानना है कि बच्चे का अपने पिता के सामने ऐसा कड़वा सच कहना असल में इस बात का सबूत है कि वह उनके साथ बेहद सुरक्षित महसूस करता है। एक टिप्पणीकार ने कहा कि बच्चा जानता है कि उसके पिता का प्यार सशर्त नहीं है, इसलिए वह बिना डरे अपना गुस्सा ज़ाहिर कर पाया।

वहीं, दूसरे पक्ष का मानना है कि किसी चार साल के बच्चे को मनाने के लिए 20 मिनट का समय देना बहुत ज़्यादा है। एक अन्य अभिभावक ने तर्क दिया कि पेरेंट्स को '5 मिनट की चेतावनी' का नियम अपनाना चाहिए और उसके बाद बिना किसी बहस के निर्णय लेना चाहिए।

क्या 20 मिनट तक बच्चे से मिन्नतें करना पेरेंटिंग का सही तरीका है या फिर सख्त सीमाएँ तय करना ज़्यादा ज़रूरी है? हमारे शो के होस्ट्स ने इस भावुक कहानी और इसके पीछे के मनोविज्ञान पर खुलकर चर्चा की है।

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