12 साल, 1.5 करोड़ बजट और बेल्जियम का शीशा: जब के. आसिफ़ के जुनून ने बॉलीवुड को हिला दिया!

मुग़ल-ए-आज़म के सेट पर ऐसा क्या हुआ था जिसके कारण फ़िल्म की रीलें जलने की कगार पर पहुँच गई थीं?
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1950 के दशक में जब बॉम्बे के फ़िल्म निर्माता कुछ लाखों में पूरी फ़िल्म बना लेते थे, तब एक निर्देशक ऐसा था जो सिर्फ़ एक गाने के सेट पर 15 लाख रुपये लुटा रहा था। नाम था के. आसिफ़ और फ़िल्म थी 'मुग़ल-ए-आज़म'।

मोहन स्टूडियो में बना शीश महल का सेट भारतीय सिनेमा के इतिहास का सबसे जटिल सेट माना जाता है। बेल्जियम से मंगाए गए शीशों से सजे इस सेट पर जब कैमरे की लाइट पड़ती थी, तो पूरा फ्रेम सफ़ेद हो जाता था।

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एक पुराने तकनीशियन के हवाले से बताया जाता है कि कैमरामैन आर.डी. माथुर कई दिनों तक सो नहीं पाए थे क्योंकि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि काँच के रिफ़्लेक्शन को कैसे रोका जाए। आखिरकार, सैकड़ों मोमबत्तियों और ट्रिप लाइटों के अनोखे कॉम्बिनेशन से 'प्यार किया तो डरना क्या' शूट हो सका।

लेकिन इस भव्यता के पीछे एक दुखद कहानी भी है। के. आसिफ़ पूरी फ़िल्म को रंगीन बनाना चाहते थे। उन्होंने लंदन से महंगी ईस्टमेनकलर रीलें मंगवाई थीं, लेकिन पैसों की तंगी और डिस्ट्रीब्यूटर्स के दबाव के कारण उन्हें आधी से ज़्यादा फ़िल्म ब्लैक एंड व्हाइट में ही रिलीज़ करनी पड़ी।

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सिनेमा के गलियारों में यह चर्चा आज भी होती है कि के. आसिफ़ ने कई ऐसे सीन्स भी शूट किए थे जो कभी थिएटर तक नहीं पहुँचे। 1971 में उनके अचानक निधन के बाद, उनके गोदामों में रखी अन-एडिटेड रीलें धूल और नमी की वजह से खराब हो गईं।

2004 में जब इस फ़िल्म को पूरी तरह रंगीन करके दोबारा रिलीज़ किया गया, तो इसने फिर से इतिहास रचा। लेकिन आज भी सवाल कायम है कि क्या हम के. आसिफ़ का असली विज़न देख पाए हैं?

इसी जुनूनी दास्तान और खोए हुए फुटेज के रहस्यों पर 'सिल्वर स्क्रीन' के आज के स्पेशल एपिसोड में हमारे होस्ट्स बेबाक चर्चा कर रहे हैं।

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