१३,५०० फीट केर ऊँचाई पर ४० साल धरि अकेले चिट्ठी बांटनिहार डाकियाक ई सच्ची कथा अहाँक आँखि भिजा देत!

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कल्पना करू एकटा एहन जगहक, जतय साल मे छओ मास बर्फक मोट चादरि बिछल रहैत अछि, तापमान शून्य सँ २५ डिग्री नीचाँ चलि जाइत अछि आ दूर-दूर धरि कोनो पक्की सड़कक नामोनिशान नहि अछि। एहन निर्जन हिमालयी घाटी मे समुद्र तल सँ १३,५०० फीट ऊपर एकटा छोट सन काठक कोठरी अछि, जकरा लोक 'अन्तिम डाकघर' कहैत अछि। आ एहि डाकघरक प्राण छथि ६४ वर्षीय बंशीधर, जे अपन जिनगीक ४० बसंत आ पतझड़ मात्र एहि बात मे खपा देलनि जे कोनो मायक आंगन मे ओकर बेटाक कुशल-क्षेम पहुंचब बंद नहि होअय।
आइ हम सब एक सेकंड मे सात समंदर पार वीडियो कॉल कऽ लैत छी। मुदा एहि सात टा छोट पहाड़ी बस्ती मे रहनिहार ४१२ लोकक लेल बंशीधरक खाकी वर्दी आ हुनकर हाथक घंटी दशकों धरि भगवानक दूत जकाँ रहल। १९८४ मे जखन २२ सालक बंशीधर पहिल बेर एतय डेग रखलनि, तखन नजदीकी सड़क सँ ३८ किलोमीटर केर खड़ी चढ़ाई पैदल पार करय पड़ैत छल। चारि दशक मे ओ लगभग १,६०,००० किलोमीटर पैदल चलल छथि—अर्थात अपन दू टा पैर सँ ओ धरतीक चारि बेर चक्कर लगा देलनि।
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एहि घाटी मे अधिकांश लोक पढ़ल-लिखल नहि छलाह। तेँ बंशीधर मात्र डाकिया नहि रहलाह; ओ हर घरक बेटा, भाई आ राजदार बनि गेलाह। ओ लोकक आंगन मे बैसि कऽ चिट्ठी पढ़ि कऽ सुनबैत छलाह आ फेर हुनकर आँखिक नोर पोछि कऽ जवाबी चिट्ठी सेहो लिखैत छलाह। चालीस साल मे ८५ हजार चिट्ठी आ १२ हजार मनीऑर्डर बांटनिहार बंशीधरक रिकॉर्ड अछि जे हुनकर हाथ सँ आइ धरि एकटा कागज सेहो नहि हेरायल।
बंशीधरक जिनगीक सबसँ झकझोरि देबय वला क्षण १९९९ केर शरद ऋतु मे आयल। घाटीक एकटा विधवा आ नेत्रहीन वृद्ध माय अपन फौजी बेटाक चिट्ठीक बाट जोहि रहल छलीह। ओहि दिन बंशीधरक थैला मे दू टा कागज छल—एकटा सरकारी लिफाफा जाहि मे बेटाक शहीद होयबाक खबरि छल, आ दोसर ओहि बेटाक हाथक लिखल अंतिम पोस्टकार्ड जे ओ मृत्यु सँ किछु दिन पहिने पठौने छल आ डाकक देरीक कारणेँ संगहि पहुंचल छल।
बंशीधरक सोझाँ धर्मसंकट खड़ा भऽ गेल। ओ ओहि दिन सरकारी चिट्ठी केँ अपन जेब मे नुका लेलनि आ माय केँ मात्र बेटाक पोस्टकार्ड पढ़ि कऽ सुनौलनि, जाहि मे लिखल छल जे ओ दीपावली मे घर आओत। वृद्ध माय राति भरि ओहि कार्ड केँ छाती सँ लगा कऽ खुशी सँ सुतलीह। अगिला दिन गामक बुजुर्ग सभक संग मिलि कऽ बंशीधर ओ दुखद सूचना देलनि। बंशीधर कहैत छथि जे ओ ओहि माय सँ हुनकर जिनगीक अंतिम चैनक राति छीनब नहि चाहैत छलाह।
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मुदा समय बदलल आ २०२२ मे घाटीक लग एकटा मोबाइल टावर लागि गेल। आब चिट्ठीक संख्या ३२० प्रति मास सँ घटि कऽ मात्र १८ रहि गेल अछि। बंशीधर एहि साल रिटायर भऽ रहल छथि आ सरकार एहि डाकघर केँ बंद करबाक विचार कऽ रहल अछि।
एहि खबरि पर आम लोक आ जानकार सभक बीच तीख बहस छिड़ि गेल अछि। एकटा टिप्पणीकार कहलनि जे आजुक युग मे मात्र किछु चिट्ठीक लेल सरकार द्वारा एतय खर्च करब पैसक बर्बादी अछि, कियाक तँ आब ड्रोन आ इंटरनेट सँ काज सेहो भऽ सकैत अछि। मुदा दोसर व्यक्ति तर्क देलनि जे जखन बर्फबारी मे टावर आ बिजली हफ्तों बंद भऽ जाइत अछि, तखन कोनो ऐप नहि, बल्कि बंशीधर जकाँ हाड़-मांसक इंसान ही वृद्ध लोकक जिनगी बचबैत अछि। एकटा अन्य पाठक भावुक भऽ कऽ कहलनि जे व्हाट्सएप संदेश तुरंत पहुंचैत अछि, मुदा ओहि मे कागजक महक आ डाकियाक अपनपन कहियो नहि आबि सकत।
की सांचहुँ हम तकनीकी रफ्तारक बदला मे मानवीय संवेदनाक हत्या कऽ रहल छी? एहि गहींर आ मर्मस्पर्शी कथाक हर पहलू पर हमर शो 'वास्तविक यात्रा' केर होस्ट लोकनि अपन नवीनतम पॉडकास्ट एपिसोड मे विस्तार सँ चर्चा कऽ रहल छथि—जरूर सुनू!
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