‘उनके दो दिन, मेरा पूरा साल’: कॉलेज छोड़ने से पहले घर में मचा बवाल

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कॉलेज जाने से पहले की सबसे भावुक रात अक्सर पैकिंग वाली होती है। इस घर में वो रात बहस में बदल गई।
एक तरफ़ हैं पाँच मूविंग बैग, जिन्हें एक स्टूडेंट ने काट-छाँटकर यहाँ तक पहुँचाया है। दूसरी तरफ़ है एक बड़ा कार वाला मिनी फ्रिज, जिसे पापा ने सफ़र के लिए खरीदा है।
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फ्रिज में दवा नहीं रखनी। कोई मेडिकल ज़रूरत नहीं है। उसमें सैंडविच रखे जाएँगे, ताकि दो दिन की ड्राइव आराम से कटे।
पापा का सुझाव सीधा है — सामान कम कर लो, बाक़ी छत पर बंधे बॉक्स में डाल दो।
स्टूडेंट का जवाब उतना ही सीधा है — इससे कम करने का मतलब है वो चीज़ें छोड़ना जिनके बिना पूरा साल निकालना मुश्किल होगा।
साथ जाने वाले पौधे भी अब लिस्ट से बाहर हो चुके हैं। उन्होंने खुद कहा है कि पौधे नहीं ले जाएँगे, जबकि उनके लिए वो सिर्फ़ हरियाली नहीं, मुश्किल दिनों का सहारा थे।
इसके बावजूद जगह पूरी नहीं पड़ रही।
हिसाब वो खुद लगा चुके हैं। उनका सारा सामान कार की डिक्की में समा जाता है। घरवालों का लगेज छत के बॉक्स में आराम से आ जाता है। अटका सिर्फ़ फ्रिज है।
एक और परत भी है। पूरा परिवार यानी चार लोग साथ जा रहे हैं, और इस फ़ैसले में स्टूडेंट से राय तक नहीं ली गई।
वैन किराए पर लेने का सुझाव आया, तो पापा ने मना कर दिया और कहा कि खर्चा बच्चे का होगा। उतने पैसे उनके पास नहीं हैं।
अपनी गाड़ी ले जाना भी विकल्प नहीं, क्योंकि कॉलेज शिकागो में है और वहाँ पब्लिक ट्रांसपोर्ट ज़्यादा सुविधाजनक है। और कॉलेज का नियम है कि सामान उतारने के लिए सिर्फ़ एक गाड़ी लाई जा सकती है।
यानी दूसरी गाड़ी में सामान भेजने का दरवाज़ा भी बंद।
जो लाइन सबसे तेज़ चुभती है: ‘उनके लिए ये दो दिन का सफ़र है, मेरे लिए ये अगला पूरा साल है।’
ये कहानी सामने आते ही लोगों ने पक्ष लेने में देर नहीं लगाई।
एक कमेंटर ने लिखा कि पाँच बैग कॉलेज के लिए हल्की पैकिंग है, और सफ़र के लिए फ्रिज की ज़िद तब तक नाजायज़ है जब तक कोई मेडिकल कारण न हो।
दूसरे ने और तीखा लिखा — ये सीधे-सीधे पिता की चूक है, क्योंकि इस सफ़र का असली किरदार बच्चा है और उसकी ज़रूरतें सबसे पहले आनी चाहिए।
एक ने अपने घर की मिसाल दी कि उनकी माँ के पास साधारण गाड़ी थी, तो उन्होंने दोस्त से वैन उधार माँग ली — क्योंकि इंतज़ाम करना पैरेंटिंग का हिस्सा है।
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तीन साल तक हॉस्टल में वॉर्डन रह चुके एक शख़्स ने बताया कि उन्होंने ज़्यादातर स्टूडेंट्स को इससे कहीं ज़्यादा सामान लाते देखा है।
एक ने बस इतना पूछा — इन सबका जाना ज़रूरी ही क्यों है?
और एक ने लिखा कि उनके माता-पिता तो सिर्फ़ पहने हुए कपड़ों में सफ़र कर लेते, अगर बच्चे को जगह चाहिए होती।
लेकिन एक दूसरा खेमा भी है, जो भावना से पहले नाप-तौल माँगता है।
एक कमेंटर ने पूछा कि हॉस्टल का कमरा कितना बड़ा है — क्योंकि मुमकिन है वहाँ पाँचों बैग का सामान रखने की जगह ही न हो। उसी ने ये भी पूछा कि क्या फ्रिज कमरे तक ले जाने को कहा जा रहा है, या वो सफ़र भर की चीज़ है।
एक ने पूछा कि गाड़ी कौन-सी है और फ्रिज कितना बड़ा, क्योंकि बिना इन दो जवाबों के फ़ैसला हवा में रहेगा।
एक और ने ठंडी हक़ीक़त रखी — जब तक सवारी का दूसरा इंतज़ाम नहीं है, आप फँसे हुए हैं, इसलिए बहस से पहले रास्ता निकालिए।
इसी खेमे से सबसे काम की सलाहें आईं। कम नाज़ुक सामान कुछ दिन पहले भेज दो ताकि वो कॉलेज के मेल सेंटर में इंतज़ार करता मिले। वैक्यूम बैग से कपड़े दबा लो। हर चीज़ को उसके डिब्बे से बाहर निकाल लो, डिब्बे ही सबसे ज़्यादा जगह खाते हैं।
एक ने सुझाया कि उसी इलाक़े से उसी कॉलेज जा रहे किसी और स्टूडेंट से पूछ लो, शायद वो थोड़ा सामान ले जाने को तैयार हो जाए।
एक ने किराए की छोटी ट्रॉली का ज़िक्र किया, जो मामूली रोज़ाना खर्च पर मिल जाती है — और साथ में कहा कि सैंडविच के लिए बर्फ़ वाला कूलर काफ़ी है।
दिलचस्प बात ये है कि दोनों खेमे एक बात पर चुपचाप सहमत हैं: फ्रिज ज़रूरत नहीं, शौक़ है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि एक खेमा इसे नाइंसाफ़ी कहता है, और दूसरा कहता है कि नाइंसाफ़ी साबित करने से डिक्की बड़ी नहीं हो जाएगी।
और बीच में खड़ा है वो स्टूडेंट, जिसने पौधे छोड़ दिए, सामान घटा दिया, और अब सिर्फ़ इतना चाहता है कि उसका पहला साल अधूरे सामान के साथ शुरू न हो।
हमारे होस्ट्स शो पर इसी सवाल को उठाते हैं — घर की गाड़ी में जगह किसकी ज़रूरत के हिसाब से बननी चाहिए।