स्विमिंग पूल में डिप्रेशन पर जीत: जब एक तैराक ने तकनीक को लात मारकर पाया असली सुकून

कोचिंग, ड्रिल्स और गैजेट्स से तंग आकर एक नए तैराक ने सारे नियम तोड़े, लेकिन इनडोर पूल की भारी भीड़ ने उसके सुकून को चुनौती दे दी।
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स्विमिंग पूल में डिप्रेशन पर जीत: जब एक तैराक ने तकनीक को लात मारकर पाया असली सुकून · Avonetics

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तैराकी के कड़े नियम, भारी-भरकम उपकरण और कोच की लगातार डांट—जब ये सब मिलकर एक नए तैराक का दम घोंटने लगे, तो उसने वही किया जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। उसने सब कुछ छोड़ दिया और पानी में एक 'आलू' की तरह तैरने का फैसला किया!

29 साल के एक उत्साही युवक ने इस साल फरवरी में जब तैराकी शुरू की, तो उसका एकमात्र सपना ट्रायथलीट बनना था। उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। 20 प्राइवेट कोचिंग सेशंस लिए, हफ्ते में तीन दिन कड़ा अभ्यास किया और दौड़ने के लिए 'काउच टू 5के' प्रोग्राम को चुटकियों में खत्म कर दिया।

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लेकिन पानी में उसकी प्रगति कछुए से भी धीमी थी। दौड़ने में जो सफलता उसे हफ्तों में मिली, तैराकी में महीनों बाद भी वह हाथ नहीं आ रही थी। निराशा के इस दौर में उसने 'शून्य से 1650' नामक तैराकी कार्यक्रम चुना और पूल में उतर गया।

फिर जो हुआ, उसने सबको चौंका दिया। आज सुबह उसने तकनीक की सारी किताबों को एक तरफ फेंक दिया। कोई फिन्स नहीं, कोई स्नोर्कल नहीं, कोई पुल बॉय नहीं और न ही हाई एल्बो की फिक्र! उसने किक मारना भी लगभग बंद कर दिया और सिर्फ पानी में खुद को ढीला छोड़ दिया।

नतीजा? पिछले कई महीनों में पहली बार वह पानी में मुस्कुरा रहा था। उसने लगातार दो घंटे तक पानी में रहकर अपने डिप्रेशन और मानसिक तनाव को पूरी तरह पीछे छोड़ दिया। वह पानी जो अब तक सजा लगता था, अचानक सुकून का समंदर बन गया।

हालांकि, कहानी में एक पेंच अब भी बाकी है। उसे अगले हफ्ते लगातार 200 मीटर तैरना है, जबकि 5 मीटर से 100 मीटर तक पहुंचने में उसे पूरे आठ महीने का लंबा वक्त लगा था। लेकिन उसका कहना है कि अब उसे परवाह नहीं—वह ब्रेस्टस्ट्रोक कर लेगा या पीठ के बल लेटकर पैर चलाएगा, पर तनाव नहीं लेगा।

इंटरनेट की गलियारों में इस खुलासे ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एक टिप्पणीकार ने इस पर सहमति जताते हुए कहा कि तैराकी दो तरह की होती है; एक वह जो दिमाग को शांत करने के लिए बिल्कुल बिना दबाव के की जाती है, जो एंग्जायटी और अवसाद में जेली की तरह राहत देती है, जबकि दूसरी दोस्तों के साथ पूरी ताकत झोंकने वाली होती है।

एक अन्य टिप्पणीकार ने समर्थन किया कि कुछ लोगों के लिए बहुत तेज धड़कनों वाला कड़ा वर्कआउट पैनिक अटैक जैसा महसूस कराता है, इसलिए कभी-कभी बिना किसी लक्ष्य के सिर्फ पानी में बहना सबसे बेहतरीन दवा साबित होता है। एक अन्य तैराक ने याद दिलाया कि 100 से 200 मीटर का सफर 5 से 100 मीटर की तुलना में कहीं अधिक आसान होता है।

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लेकिन हर कोई इस लापरवाही से खुश नहीं है। एक अनुभवी टिप्पणीकार ने तीखा कटाक्ष करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति दो घंटे पानी में समय बिता सकता है लेकिन 200 मीटर तैरने से कांप रहा है, तो उसकी तकनीक में भारी खामी है और बिना कोच या मास्टर प्रोग्राम के उसका ट्रायथलॉन का सपना पूरी तरह बिखर जाएगा।

इस मानसिक द्वंद्व के बीच कहानी का एक और कड़वा पहलू भी सामने आया है। जैसे ही गर्मियों का आउटडोर सीजन खत्म हुआ और तैराकों को 25 मीटर के इनडोर पूल में लौटना पड़ा, वहां अव्यवस्था का सैलाब आ गया।

पूल हफ्ते में ढाई दिन जनता के लिए बंद रहता है, और बची हुई तीन लेन्स में से एक हमेशा आरक्षित रहती है। शाम के समय एक संकरी लेन में आठ से दस लोग एक साथ तैरने की कोशिश कर रहे होते हैं। स्थिति इतनी बदतर है कि धीमी गति वाले तैराकों की वजह से कोई आगे नहीं निकल पाता।

एक स्ट्रोक मारते ही आगे वाले तैराक के पैर छू जाते हैं। जिस पानी में कोई मानसिक शांति की तलाश में गया था, वहां अब क्लॉस्ट्रोफोबिया और झुंझलाहट का सामना करना पड़ रहा है। धीमी गति और भारी भीड़ के इस ट्रैफिक जाम ने कई तैराकों का हौसला तोड़ दिया है।

क्या तकनीक को दरकिनार करके सिर्फ खुशी के लिए तैरना सही है, या इनडोर पूल की इस अराजकता में अनुशासन ही एकमात्र सहारा है? इस पूरे ड्रामे और इसके दोनों पहलुओं पर गहराई से विचार करने के लिए हमारे शो 'डीप डाइव' के होस्ट अनन्या और सचिन पॉडकास्ट के ताजा एपिसोड में आमने-सामने टकरा रहे हैं।

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