संविधान बदलने की जरूरत नहीं! ये आसान चुनाव सुधार ला सकते हैं असली लोकतंत्र

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जब भी किसी देश में चुनावी नतीजे असंतुलित आते हैं, तो राजनेता और विशेषज्ञ तुरंत पूरे संविधान और चुनावी व्यवस्था को बदलने का झंडा उठा लेते हैं। ब्रिटेन के 2024 के नतीजों ने, जहाँ 34 प्रतिशत वोट पाने वाली लेबर पार्टी को 63 प्रतिशत सीटें मिल गईं, इस बहस को फिर से गरमा दिया है। लेकिन क्या वाकई पूरे तंत्र को उखाड़ फेंकना ही एकमात्र विकल्प है?
राजनीतिक विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग अब यह मानने लगा है कि असंभव संवैधानिक संशोधनों के पीछे भागने के बजाय उन सुधारों पर ध्यान देना चाहिए जिन्हें आसानी से लागू किया जा सकता है। इनमें सबसे प्रमुख समाधान है — 'इंस्टेंट रनऑफ़ वोटिंग' (IRV) या रैंक्ड चॉइस वोटिंग।
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एक चुनावी विश्लेषक ने कहा कि इंस्टेंट रनऑफ़ वोटिंग में मतदाताओं को यह अधिकार मिलता है कि वे उम्मीदवारों को अपनी पहली, दूसरी और तीसरी पसंद के हिसाब से रैंक कर सकें। इससे अगर आपकी पहली पसंद का उम्मीदवार दौड़ से बाहर होता है, तो आपका वोट बेकार जाने के बजाय आपकी दूसरी पसंद को स्थानांतरित हो जाता है। इस प्रणाली में किसी भी उम्मीदवार को जीतने के लिए 50 प्रतिशत से अधिक वोटों का समर्थन पाना ही पड़ता है, जिससे जनमत की सही हार-जीत तय होती है।
इसके अलावा, एक अन्य विशेषज्ञ ने सुझाव दिया कि विधायिका या संसद की सीटों की संख्या पर लगी सीमा को हटाना चाहिए। यदि प्रतिनिधि और आबादी का अनुपात सही कर दिया जाए — मसलन हर 3-4 लाख नागरिकों पर एक प्रतिनिधि — तो चुनावी असंतुलन अपने आप काफी हद तक कम हो जाएगा।
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हालाँकि, कुछ कट्टरपंथी सुधारकों का मानना है कि ये केवल अस्थायी उपाय हैं। उनका कहना है कि जब तक फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली को पूरी तरह खत्म करके समानुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं लाया जाता, तब तक लोकतंत्र में आम नागरिक को उसकी सही आवाज़ नहीं मिल पाएगी।
क्या हम एक असंभव राजनीतिक क्रांति के इंतज़ार में आसान और असरदार सुधारों को नजरअंदाज कर रहे हैं? इस संवेदनशील राजनीतिक मुद्दे का पूरा विश्लेषण सुनने के लिए हमारे शो 'सियासत' के इस नए एपिसोड को ज़रूर ट्यून करें।