फीफा के खिलाफ यूरोपीय क्लबों की बगावत और कावाई लियोनार्ड का गुप्त डील स्कैंडल: खेल जगत में भूचाल

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खेल जगत में इस समय दो बड़ी शक्तियों के बीच जबर्दस्त टकराव चल रहा है। एक तरफ फुटबॉल की सबसे बड़ी संस्था फीफा है, तो दूसरी तरफ यूरोप के अरबपति क्लब मालिक और उनके थके हुए खिलाड़ी। फीफा द्वारा क्लब वर्ल्ड कप के विस्तार की योजनाओं पर अब पानी फिरता नज़र आ रहा है, क्योंकि यूरोप के शीर्ष क्लबों ने इस नए टूर्नामेंट के पूरी तरह से बहिष्कार की धमकी दे डाली है।
समस्या की जड़ है लगातार बढ़ता हुआ फिक्स्चर कैलेंडर। आधुनिक फुटबॉल खिलाड़ी पहले से ही डोमेस्टिक लीग, नेशनल कप, चैंपियंस लीग और अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों के बीच पिस रहे हैं। एक सीज़न में 70 से अधिक मैच खेलने के कारण खिलाड़ियों की चोटों में भारी इज़ाफ़ा हुआ है।
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मामले पर टिप्पणी करते हुए एक खेल प्रशंसक ने कहा कि क्लबों का फीफा के ख़िलाफ़ खड़ा होना बिल्कुल सही है। जब शेड्यूल पहले ही इतना व्यस्त है, तो केवल टीवी राइट्स और पैसे के लिए और मैच थोप देना सरासर अन्याय है। वहीं एक अन्य आलोचक ने तीखा तंज कसते हुए कहा कि यह सिर्फ़ अरबपति मालिकों और करोड़पति खिलाड़ियों के बीच का झगड़ा है कि कौन किसे कितना भुना सकता है।
दूसरी ओर, बास्केटबॉल की दुनिया में भी कुछ ऐसा ही गुप्त खेल सामने आया है। एनबीए स्टार कावाई लियोनार्ड और एलए क्लिपर्स से जुड़ा एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। खोजी पत्रकार पाब्लो टोरे के अनुसार, क्लिपर्स के एक स्पॉन्सरशिप सौदे में गंभीर गड़बड़ी पाई गई।
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रिपोर्ट्स के मुताबिक, कावाई लियोनार्ड ने उन अघोषित मल्टी-मिलियन डॉलर स्पॉन्सरशिप डील्स के लिए कोई भी प्रचार काम करने से इनकार कर दिया, जिन्हें कथित तौर पर एनबीए की 'सैलरी कैप' सीमा को दरकिनार करने के लिए तैयार किया गया था। यानी फ़्रैंचाइज़ी खिलाड़ी को गुपचुप तरीक़े से नियम तोड़कर अतिरिक्त पैसे देना चाहती थी, लेकिन खिलाड़ी ने ही इसमें सहयोग करने से हाथ खड़े कर दिए।
ये दोनों ही घटनाएँ दिखाती हैं कि आधुनिक खेलों में कॉर्पोरेट लालच किस हद तक बढ़ चुका है। चाहे फीफा का नया टूर्नामेंट हो या एनबीए में पैसों की हेराफेरी, खेल के असली स्पिरिट पर कमर्शियल दबाव भारी पड़ रहा है।
इस पूरे ड्रामा पर हमारे शो 'एक्स्ट्रा टाइम' के पॉडकास्ट एपिसोड में होस्ट्स ने तीखी बहस की है और अपना अंतिम फ़ैसला सुनाया है।
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